Begleiten Sie uns auf eine literarische Weltreise!
Buch zum Bücherregal hinzufügen
Grey
Einen neuen Kommentar schreiben Default profile 50px
Grey
Jetzt das ganze Buch im Abo oder die ersten Seiten gratis lesen!
All characters reduced
मुझे डे-केयर सेंटर जाना बहुत पसंद है - cover

मुझे डे-केयर सेंटर जाना बहुत पसंद है

Shelley Admont, KidKiddos Books

Verlag: KidKiddos Books

  • 0
  • 0
  • 0

Beschreibung

छोटा खरगोश जिमी बहुत उदास और घबराया हुआ है। कल उसका डे-केयर में पहला दिन है, लेकिन वो  घर पर अपनी मम्मी के साथ रहना चाहता है। यह जानने के लिए, कि उसका टेडी बियर उसे जोश दिलाने और ख़ुश महसूस कराने में कैसे मदद करता है, जिमी के साथ जुड़ कर इस रोचक यात्रा पर चलें। 
यह बच्चों की किताब आपके नन्हे मुन्नों की पहली बार अपने माता-पिता को छोड़ कर जाने की चिंताओं को दूर करने में मदद करेगी, इसके साथ साथ यह उन्हें नए बदलाव को अपनाने में भी मदद करेगी। 
अंत में, जिमी को समझ आ गया कि डे-केयर कितना मज़ेदार होता है!
यह कहानी सोने के समय बच्चों को सुनाने के लिए उपयुक्त है और पूरे परिवार के लिए मनोरंजक भी है! 
Verfügbar seit: 20.01.2023.
Drucklänge: 34 Seiten.

Weitere Bücher, die Sie mögen werden

  • जीवनसंजीवनी - cover

    जीवनसंजीवनी

    शिवांगी तिवारी मिश्रा

    • 0
    • 0
    • 0
    मानव शरीर कई बीमारियों से जूझता है। उन शारीरिक बीमारियों का इलाज इस भौतिक जगत में विभिन्न औषधियों व उपचारों से संभव हो जाता है। ठीक उसी प्रकार मानव जीवन भी कई समस्याओं व परेशानियों से जूझता रहता व संघर्ष करता रहता है जिसके लिए कोई भी औषधि व उपचार इस भौतिक जगत में संभव नहीं। का की सभी समस्याओं व परेशानियों मनुष्य उपचार उसके भीतर गुण रूपी औषधि के रूप में विद्यमान है। ज़रूरत है सिर्फ इन गुण रूपी औषधियों को अपनी परेशानियों व समस्याओं के अनुसार प्रयोग करने की फिर मनुष्य स्वतः ही इनसे निजात पा सकता है। प्रस्तुत पुस्तक में कविताओं के माध्यम से उन गुणों .व परेशानियों को दर्शाया गया है है जो हर मनुष्य के भीतर विद्यमान तो हैं पर परिस्थिति और हालातों के कारण अंतरमन में कहीं दब से गए हैं है जैसा की हम जानते प्रभु श्रीराम भक्त हनुमान जी सर्वशक्तिशाली है पर वह अपनी शक्तियों को भूल न चुके थे पर जैसे ही उन्हें उनकी शक्तियों का बोध करवाया गया उन्होंने तुरंत ही एक छलांग में महासागर पार किया और लंका पहुँच गए। वैसे ही आत्मचिंतन द्वारा मनुष्य अपने भीतर छुपे गुणों को जान सकता है और उन्हें औषधियों के रूप में प्रयोग कर जीवन की परेशानियों से निजात पा सकता है।'जीवन संजीवनी' एक माध्यम बन सकती है आपके लिए जो आपके भीतर कहीं दबे हुए गुणों को आपसे रू-ब-रू करवाने में सहायक बन सकती है। जीवन में कभी हार न मानो आत्मचिंतन से स्वयं को पहचानो, 1 परेशानियाँ भी तुमसे कर लेंगी किनारा, का। पर पहले अपने भीतर के गुणों को 
    Zum Buch
  • अफसर के रिटायरमेंट का दर्द - cover

    अफसर के रिटायरमेंट का दर्द

    धोंडो केशव कर्वे

    • 0
    • 0
    • 0
     व्यंग्य लेखन से मेरा उद्देश्य लोगों का मजाक उड़ाकर उन्हें हँसी का पात्र बनाकर सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करना नही है ।  
    समाज में कुछ ऐसी बातें व्याप्त है, जो आम आदमी ठगे जाने के बाद भी समझ नहीं पाता है और दिन प्रतिदिन पिसता जाता है ।  
    ऐसी बातों को अपने लेखों ओैर व्यंग्यों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना ही मेरा उद्देश्य रहा है ।  
        इसके अलावा ऐसे लोगों को भी दर्पण दिखाना रहा है जो छल कपट चोरी ,बेईमानी करने के बाद भी समझते है कि उन्होने कुछ नहीं किया है और उनके बारे में लोगों को कुछ नहीं मालूम है, जबकि समाज में इसके विपरीत उल्टा असर रहता है ।  
        हमारा भारतीय समाज दहेज प्रथा, जातिप्रथा, धार्मिकता, अंधविश्वास, गरीबी, बेकारी आदि आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, बुराईयों से ग्रस्त है,  
    जिसमें सबसे ज्यादा प्रभावित, देश का आम आदमी है और आम आदमी को ही अपने लेखों का नायक बनाकर प्रायः व्यंग्य लिखे गये हैं । जिसमें अधिक से अधिक समस्याओं को हल सहित उठाये जाने का प्रयास किया गया हैं। 
        आस पास में व्याप्त विषमताओं चेहरे पर चेहरे लगाये, रंग बदलते चेहरे को देखकर उन्हें सरल सीधे शब्दो में बिना लाग लपेट के व्यंग्य के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है  
    और व्यंग्य ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा अपने और अपनो पर चोट करके लोगो को समझाया जा सकता है ।
    Zum Buch
  • दास्तान - ए - विकासनगर - cover

    दास्तान - ए - विकासनगर

    अश्विनी पराशर

    • 0
    • 0
    • 0
    औद्योगिक शहर ‘विकास नगर’ में विकास का एक नया मॉडल आया है। कंपनी का प्रोडक्शन कई गुना बढ़ा है, लेकिन यहाँ के बाशिंदों का जीवन गरीबी, बेरोजगारी और भूखमरी से बेहाल है। यह शहर एक नया इतिहास लिख रहा है। ‘विकास नगर’ के इतिहास की असेंबली लाईन से गुजरने वाले किरदारों की कहानियाँ बहुत दिलचस्प हैं। ये किरदार न केवल एक भौगोलिक क्षेत्र में साथ-साथ रहते हैं, बल्कि एक दूसरे पर निर्भर भी हैं और आपस में परिचित न भी हों तब भी एक ही आर्थिक और सामाजिक आबोहवा में सांसें लेते हैं। "दास्ताने विकास नगर" विकास के अनपेक्षित परिणामों और एक बदलते परिदृश्य में निवासियों के संघर्ष और विजय का दस्तावेज है।
    Zum Buch
  • ध्यान की विधि - cover

    ध्यान की विधि

    जॉन रूथन

    • 0
    • 0
    • 0
    असाधारण स्पष्टता वाला एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक, जॉन रूथन की द मेथड ऑफ मेडिटेशन एक सरल लेकिन मांग वाली राह को प्रकट करता है जो जीवंत आंतरिक प्रार्थना की ओर ले जाती है, जो पवित्र आत्मा के अभिषेक और सही ढंग से व्यवस्थित इच्छाशक्ति की शक्ति से पोषित होती है। यह कार्य एक पूर्ण शिक्षाशास्त्र प्रस्तुत करता है: हृदय को तैयार करें (अहंकार, विक्षेप और लगाव को दूर करके) और स्वयं को विनम्रता, सतर्कता और आत्म-नियंत्रण के माध्यम से तैयार करें; फिर ठोस “प्रारंभिक अभ्यासों” के साथ प्रार्थना में प्रवेश करें, स्मृति, बुद्धि और इच्छाशक्ति का उपयोग करते हुए; अंत में, समाप्त करें और समीक्षा करें ताकि हर प्रकाश स्थायी संकल्प बन जाए। रूथन सट्टेबाजी से प्रार्थना में संक्रमण की कला सिखाते हैं: वास्तविक भावनाओं को जगाना, वर्तमान स्थिति के अनुकूल व्यावहारिक निर्णय बनाना, ठोस प्रेरणाओं पर आधारित और अनुग्रह द्वारा समर्थित। एक गहन रूप से सन्निहित विधि (सरल प्रश्न, सटीक जांच, सावधानीपूर्वक पुनरावृत्ति) के माध्यम से, यह क्लासिक जीवन को व्यवस्थित करने, गुणों को मजबूत करने और शांति में दृढ़ रहने में मदद करता है। संयम से पढ़ने पर, यह ऑडियोबुक गहरी प्रार्थना और एकीकृत जीवन की तलाश करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए दैनिक साथी बन जाती है।
    Zum Buch
  • नियत में खोट विवादों में कोर्ट - cover

    नियत में खोट विवादों में कोर्ट

    प्रवीण कुमार केसरी

    • 0
    • 0
    • 0
    प्रवीण कुमार केसरी का आलेख नियत में खोट विवादों में कोर्ट
    Zum Buch
  • 10th Fail - cover

    10th Fail

    Ajay Raj Singh

    • 0
    • 0
    • 0
    जीवन में लगे हर आग का कारण सिर्फ आपकी गलतियाँ नहीं होती हैं, कुछ आपकी किस्मत भी सुलगा देती है। ये कहानी है बबलू शुक्ला की। जनाब कांट्रेक्टर हैं। 28 के हो गए हैं, पर शादी नहीं हुई अभी तक। खुद कुछ कर नहीं पाए, अम्मा को कुछ करने नहीं देते। ये गाँव के वो युवा हैं, जो इनकी उम्र में अविवाहित रह जाएँ तो लोग युवा कहने से भी कतराने लगते हैं। शादी से डरते नहीं हैं, बस थोड़ा नरबसा जाते हैं। ठेकेदारी की शुरुआत छोटे-मोटे कामों से हुई थी, पर जब से इनको समझ आया है कि रिश्वत देकर सरकारी tender मिल जाते हैं, काम अलग ही level पर पहुँच गया है। इस कहानी में एक लड़का है, एक लड़की है, दो दोस्त हैं, एक गाँव है। वो सब कुछ, जो हो सकता है। पर इसके साथ मिलेगा शुक्ला जी का खुद पर अपार विश्वास, धंधे में आ रही दिक्कतें, रिश्तों की गहराई, नैतिकता पर सवाल और हल्का सा इश्क। बस... हल्का सा।
    Zum Buch