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Cheekhati Aawazein - 1 #2 - cover

Cheekhati Aawazein - 1 #2

Dhruv Singh 'Eklavya'

Publisher: Prachi Digital Publication

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Summary

प्रस्तुत काव्य-संग्रह 'चीख़ती आवाज़ें' उन दबी हुई संवेदनाओं का अनुभव मात्र है जिसे कवि ने अपने जीवन के दौरान प्रत्येक क्षण महसूस किया। हम अपने चारों ओर निरंतर ही एक ध्वनि विस्तारित होने का अनुभव करते हैं परन्तु जिंदगी की चकाचौंध में इसे अनदेखा करना हमारा स्वभाव बनता जा रहा है। ये ध्वनियाँ केवल ध्वनिमात्र ही नहीं बल्कि समय की दरकार है। मानवमात्र की चेतना जागृत करने का शंखनाद है। यही उद्घोषणा जब धरातल पर आने की इच्छा प्रकट करती है तब 'लेखनी' से स्वतः ही संवेदनायें शब्दों के रूप में एक 'चलचित्र' की भाँति प्रस्फुटित होने लगती हैं और मानवसमाज से एक अपेक्षा रखती हैं कि इन मृतप्राय हो चुकीं संवेदनाओं को पुनर्जीवित होने का 'वरदान' मिले ! प्राकृतिक संसाधनों का ध्रुवीकरण आज एक वृहत्त समस्या बनती जा रही है। हम अपने स्वार्थ के वशीभूत नैतिक मूल्यों की निरंतर अवहेलना करते चले जा रहे हैं। एक तबका और अधिक धनवान होने की दौड़ में भाग रहा है जबकि दूसरा तबका निर्धन से अतिनिर्धनता की दिशा में अग्रसर है। संसाधनों का ध्रुवीकरण इसका मूल कारण है। एक पाले में अपने हक़ के लिए निरंतर संघर्षरत 'कृषक' और 'मज़दूर' तो दूसरी तरफ अपने अस्तित्व को तलाशती 'स्त्री',दोनों की दशा और दिशा आज समाज में विचारणीय है। 'चीख़ती आवाज़ें' काव्य-संग्रह में संकलित सभी रचनायें किसी न किसी 'भाव' में मानवसमाज में फैले असमानता का प्रखर विरोध करतीं हैं।

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    ‘‘एक्सक्यूज मी।’‘ 
    ‘‘यस !’‘ बैंक मैनेजर भोले शंकर ने नजर उठाकर उस गोरी चिट्टी, अंग्रेज सी दिखने वाली महिला को देखा, जो कन्धे से बैग लटकाये उसके सामने खड़ी थी। 
    ‘‘कहिए, मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूं !’‘ उसने पूछा। 
    ‘‘जी, मुझे गोल्ड लोन लेना है।’‘ 
    ‘‘हैव दिस सीट प्लीज ! आप बैठ जाइये।’‘ भोले शंकर ने कहा तो महिला उसके सामने वाली सीट पर बैठ गयी। उसने कन्धे से अपना बैग उतारकर मेज पर रख दिया। 
    भोले शंकर ने गौर से महिला को देखा। वह पचास से ऊपर की लग रही थी। गरदन तक घने, घुंघराले बाल आगे से कुछ पके हुए थे और आंखों के नीचे झुर्रियां पड़ गर्इ थीं। 
    ‘‘किस काम के लिये आपको लोन चाहिए ?’‘ उसने शालीनता से पूछा। 
    ‘‘जी। मैंने एक रीहैबिलिटेशन सेन्टर खोल रखा है, जहां मैं नशे के शिकार, भटके हुए बच्चों को वापस जीवन से जोड़ने की कोशिश करती हूं। जगह थोड़ी कम पड़ने लगी है, तो उसके एक्सटेंशन के लिये लोन चाहिए।’‘ 
    ‘‘अच्छी बात है,’‘ भोले शंकर महिला से प्रभावित होकर बोला, ‘‘पर इसके लिये तो सरकारी ऐड भी मिलता है, फिर आप अपने गहनों पर लोन क्यों लेना चाहती हैं ?’‘ 
    ‘‘देखिए, यह काम मैं बिल्कुल निजी तौर पर करती हूं, इसलिये सरकारी मदद की अपेक्षा नहीं रखती।’‘ 
    ‘‘बहुत बढ़िया।’‘ भोले शंकर के मन में महिला के प्रति काफी सम्मान जगा। उसने तुरत घन्टी बजाकर ऑफिस अटेन्डेन्ट को बुलाया और उसे मैम के लिये एक कप बढ़िया चाय लाने को कहा। 
    ‘‘कितना लोन चाहिए आपको ?’‘ उसने अटेन्डेन्ट के जाने के बाद महिला से पूछा। 
    ‘‘दो लाख रूपये।’‘ 
    ‘‘इतनी रकम के लिये आपको कम से कम तीन लाख के जेवर मॉरगेज करने होंगे।’‘ भोले शंकर ने कैलकुलेटर पर हिसाब जोड़कर बताया। 
    ‘‘एक्सक्यूज मी।’‘ 
    ‘‘यस !’‘ बैंक मैनेजर भोले शंकर ने नजर उठाकर उस गोरी चिट्टी, अंग्रेज सी दिखने वाली महिला को देखा, जो कन्धे से बैग लटकाये उसके सामने खड़ी थी। 
    ‘‘कहिए, मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूं !’‘ उसने पूछा। 
    ‘‘जी, मुझे गोल्ड लोन लेना है।’‘ 
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    ‘‘किस काम के लिये आपको लोन चाहिए ?’‘ उसने शालीनता से पूछा। 
    ‘‘जी। मैंने एक रीहैबिलिटेशन सेन्टर खोल रखा है, जहां मैं नशे के शिकार, भटके हुए बच्चों को वापस जीवन से जोड़ने की कोशिश करती हूं। जगह थोड़ी कम पड़ने लगी है, तो उसके एक्सटेंशन के लिये लोन चाहिए।’‘ 
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    ‘‘देखिए, यह काम मैं बिल्कुल निजी तौर पर करती हूं, इसलिये सरकारी मदद की अपेक्षा नहीं रखती।’‘ 
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